navneetbakshi

Thursday, January 19, 2006

Voh Batein

वो बातें जो कह न सकी तुम
लेटा रहता था जब आँखें मूँदे
तुम्हारी झोली में मैं रख कर सर
वो बातें जो कह न सकी तुम
जो कहना तो चाहती थी पर
कुछ शर्मा कर,
कुछ लज्जा कर किसी बहाने
टाल दिया करती अक्सर
वो बातें जो कह न सकी तुम
रह गई अनकही अधूरी
अब भी आ-आ कर हवा
कानों में कह जाती है
गा उठती हैं दिशाँए
पत्ते करते हैं सर-सर
वो तुम्हारे प्रेम के इज़हार का अन्दाज़ था
जिसे जानते थे सब
बस इक मैं ही था बे-खबर
नवनीत बक्शी

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