navneetbakshi

Sunday, January 22, 2006

Selection

सिलेक्शन
बोला मेरा मित्र मैं एक्सेप्ट हो गया हूँ
मैंने कहा शायद् तुम सिलेक्ट कहना चाहते हो
लेकिन कह नहीं पाते
क्यों कि अंग्रेज़ी में तुम्हारा हाथ तंग ही रहा है।
पर कोई नहीं भारत का नवयुवक
तो इसी कमी के साथ जी रहा है
फिर तुम क्यों हो घबराते
लोग अंग्रेज़ी में अपना हाल
अक्सर सही बयाँ नहीं कर पाते।
लेकिन सिलेक्शन, रिजेक्शन की बात आई कहाँ से?
कौन सा इम्तिहान दे कर आये हो भाई
मुझे कुछ तो बताया होता
कुछ तो मदद की होती मैने
थोड़ा तो तैयार करवाया होता ।
मेरे प्रश् नों के उत्तने मुझे एक तार दिखाया
जिस में लिखा था "Anjali accepts you"
पढ़ कर मेरा मुँह उतर गया
और मैं विचारों में खो गया
मुझे यों चुप्प देख वह बोला, क्या हुआ?
मैंने कहा हुआ तो नहीं पर
अब होने जा रहा है
शहीद एक मित्र जो
अभी तो हस रहा है
पर शीघ्र ही रोने जा रहा है।
आसार अच्छा नहीं है
पहले चौकन्ना ना किया
तो कहो गे यार अच्छा नहीं है।
मैंने तो सोचा कि शायद
शब्दों का प्रयोग उचित नहीं है
पर सत्य तो यह है कि योग उचित नहीं है।
तुम्हारी अंग्रेज़ी तो सदा ही रही केवल प्रयास है
लेकिन उन्हें उपयुक्त शब्द चुनने का काफी अभ्यास है
यह तो दक्षता का अनूठा उदाहरण है
अभिमान ही सिलेक्ट के प्रयोग का कारण है
वो तुम्हें काना बैंगन समझते हैं
जिसे सब्ज़ीवाले के अनुग्रह पर
ग्राहक ने स्वीकार लिया हो ।
सस्ता सोच आँख मींच ली हो
मन को मार लिया हो ।
कुछ भी हो मुझे तो
दाल में कुछ काला नज़र आता है
लड़की का भाई नहीं
बाप साला नज़र आता है
जो अपनी टाँग ऊपर रखना चाहता है
इस लिए तुम्हें एहसास दिलाना चाहता है
कि तुम काबिल तो नहीं फिर भी
एक्सैप्ट कर लिए गए हो
और तुम ऐसे खिले खिले हो
जैसे औलम्पिक्स में भारत का परचम लिये चले हो
अपने को खुशनसीब बताते हो
ज़्यादा न वेट करना चाहते हो
पार्टी देकर सैलिब्रेट "celebrate" करना चाहते हो ।
मेरी मानो तो सम्भल जाओ
लोगों को रविवार को मातम के लिये बुलाओ
सब मिल बैठ कर रोंएगे
अपने आँसुओं से तुम्हारे रुमाल भिगोयेंगे
लेकिन तुम ऐसे दौर में पहुँच गए हो
जहाँ से कोई वापिस नहीं आता
दिन हो गये सुहाने लगते हैं
शुभचिन्तक बेवकूफ और उनके सुझाव बचकाने लगते हैं
सच बिल्कुल रुका नहीं जाता
झूम-झूम गाता है मन,
कूँआ भी नज़र नहीं आता
क्योंकि तुम कूदने जा रहे हो
हम रोकेंगे नहीं
न ही रोक सकेंगे
चलो तुम्हारी पार्टी को हम farewell ही कहेंगे।
नवनीत बक्शी

Thursday, January 19, 2006

Voh Batein

वो बातें जो कह न सकी तुम
लेटा रहता था जब आँखें मूँदे
तुम्हारी झोली में मैं रख कर सर
वो बातें जो कह न सकी तुम
जो कहना तो चाहती थी पर
कुछ शर्मा कर,
कुछ लज्जा कर किसी बहाने
टाल दिया करती अक्सर
वो बातें जो कह न सकी तुम
रह गई अनकही अधूरी
अब भी आ-आ कर हवा
कानों में कह जाती है
गा उठती हैं दिशाँए
पत्ते करते हैं सर-सर
वो तुम्हारे प्रेम के इज़हार का अन्दाज़ था
जिसे जानते थे सब
बस इक मैं ही था बे-खबर
नवनीत बक्शी

Tuesday, January 17, 2006

Kuchh Naya Ho Jaye

मुझे कहनी है एक बात
तुम से मेरे हमसफर
पर जरा कान तो करो इधर
और वो पास आकर
बोली गुनगुनाकर
हम चाहते तो नहीं थे अभी मगर
डाक्टर ने कन्फर्म दिया है कर
कि हम हैं माँ बनने के पथ पर
मैंने कहा but...लेकिन...परन्तु... पर
पिछले एक साल से
मैं तो था विदेश के दौरे पर
फिर ये बच्चा किस का है प्रियवर?
कुछ तो कहो कम से कम
ये सच है कि भ्रम
बोली वो सनम तुम्हारी कसम
सच ना तुम जानो ना हम